बाढ़ पीड़ित की आत्मकथा
मैं नदी किनारे बसे गाँव का रहने वाला हूँ, जो उस वर्ष बाढ़ में डूब गया। पहाड़ों पर मूसलाधार बारिश हुई और रात में नदी उफनकर गाँव में घुस आई। घर, खेत और पशु सब जलमग्न हो गए।
मैं माँ और छोटी बहन के साथ छत पर चढ़ गया। तीन दिन भूख-प्यास और ठंड से जूझते रहे। सरकारी नावों ने बचाकर राहत शिविर पहुँचाया, जहाँ अनाज, कपड़े और दवाइयाँ मिलीं।
बाढ़ ने मेरी सारी पूँजी बहा दी, फिर भी हमने हिम्मत नहीं छोड़ी। गाँव लौटकर घर बनाया और खेती शुरू की। अब समझता हूँ कि पेड़ लगाकर प्रकृति बचानी चाहिए।