किसान की आत्मकथा
मैं इस धरती का पुत्र हूँ। सुबह सूरज उगने से पहले मैं अपने खेत में पहुँच जाता हूँ। हल, बैल और मेरे हाथ – यही मेरी पूँजी है। माटी से मेरा रिश्ता किसी रिश्ते से कम नहीं। जब बीज अंकुरित होकर हरा-भरा होता है, तब मेरा मन खुशी से भर जाता है।
पर मेरा जीवन सुखों से भरा नहीं है। बारिश के भरोसे मैं बीज बोता हूँ। कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी कीट तो कभी बाजार में फसल के दाम गिरना – हर मौसम मुझे परीक्षा में डालता है। कर्ज में डूबकर भी मैं अपनी माटी का मोह नहीं छोड़ता।
फिर भी मुझे गर्व है कि मैं देश के लोगों का पेट भरता हूँ। जो अन्न हम पैदा करते हैं, उसी से पूरा देश जीता है। सरकार और समाज अगर हमारी मेहनत का उचित मोल दे, तो किसान का जीवन भी खुशहाल हो सकता है। मैं माटी का पुत्र हूँ और माटी के लिए जिऊँगा।