पंक्तियाँ : गजल का पहला शेर (स्वर्णिम शिखर और नींव वाला) और जुगनू वाला शेर।
केंद्रीय भाव : पहले शेर में गजलकार कहता है कि चमकते सुनहले शिखर की तरह केवल दिखावे के लिए ऊँचा दिखने की जरूरत नहीं है। यदि दिखना ही है तो नींव की तरह दिखो, जो छिपी रहकर भी पूरी इमारत को मजबूती देती है। दूसरे शेर में छोटा-सा जुगनू भी साथ देने का वचन देता है और कहता है कि समय की इस धुंध (कठिन परिस्थितियों) में तुम रोशनी बनकर दिखो। इन पंक्तियों का केंद्रीय भाव है कि मनुष्य को रूप-रंग या दिखावे से नहीं, अपने ठोस कर्मों से सुंदर बनना चाहिए और कठिन समय में दूसरों का मार्गदर्शक बनना चाहिए।