कला किसी भी समाज की संस्कृति और पहचान होती है। लोककलाएँ, हस्तकलाएँ, संगीत, नृत्य, चित्रकला – ये सब पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को जीवित रखती हैं। कलाकार अपनी साधना, धैर्य और मेहनत से साधारण वस्तु को भी सुंदर बना देता है, जैसे सिरचन मोथी और बाँस से अद्भुत चिक और शीतलपाटी बनाता था। परंतु आज मशीनों से बनी सस्ती चीजों के कारण ऐसे कारीगरों को उचित मजदूरी और सम्मान नहीं मिलता; उन्हें ‘बेकार’ या ‘कामचोर’ समझा जाता है। कलाकार स्वाभिमानी होता है; उसे पैसे से अधिक आदर की भूख होती है। ‘ठेस’ कहानी में भी अपमान से सिरचन का दिल टूट गया था। इसलिए हमें कलाकारों को उचित पारिश्रमिक देना चाहिए, उनकी बनाई वस्तुएँ खरीदनी चाहिए और उनसे आदर से बात करनी चाहिए। कला और कलाकार का सम्मान करना हमारी संस्कृति का सम्मान करना है।
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Doubtly AI
· 25 Oct 2026
AI-verified · Oct 2026
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