- ‘घन घमंड नभ गरजत घोरा...’ — आकाश में बादल घमंड से भयंकर गर्जना कर रहे हैं । प्रिया (सीता) के बिना श्रीराम का मन डर रहा है ।
- ‘दामिनि दमक रहिं घन माहीं...’ — बादलों में बिजली चमककर तुरंत छिप जाती है, ठीक वैसे ही जैसे दुष्ट की मित्रता स्थिर नहीं रहती ।
- ‘बरषहिं जलद भूमि निअराएँ...’ — बादल धरती के पास झुककर बरसते हैं, जैसे विद्वान विद्या पाकर विनम्र हो जाते हैं ।
- ‘छुद्र नदी भरि चली तोराई...’ — छोटी नदियाँ थोड़े-से जल से भरकर किनारे तोड़ती हुई बहने लगती हैं, जैसे दुष्ट व्यक्ति थोड़ा-सा धन पाकर इतराने लगता है ।
(इसी प्रकार ‘समिटि-समिटि जल भरहिं तलावा’ — जैसे जल सिमट-सिमटकर तालाब में भरता है, वैसे ही सद्गुण धीरे-धीरे सज्जन के पास आ जाते हैं ।)