परोपकार का अर्थ है बिना स्वार्थ के दूसरों की भलाई करना । जिस समाज में लोग केवल अपना लाभ देखते हैं, वहाँ स्पर्धा, शोषण और अशांति बढ़ती है; थोड़े-से लोग ही लाभ उठाते हैं और बहुसंख्यकों को हानि पहुँचती है । ऐसे समाज में ‘जंगल का कानून’ चलने लगता है ।
इसके विपरीत जहाँ लोग एक-दूसरे की सहायता करते हैं, अपनी आवश्यकता से अधिक संपत्ति का उपयोग दूसरों के लिए करते हैं, वहाँ सहयोग, विश्वास और समता बढ़ती है । हमारी योग्यता भी समाज की कृपा से ही बनती है, इसलिए समाज को अधिक-से-अधिक देना हमारा कर्तव्य है ।
अस्पताल, विद्यालय, अनाथालय जैसे कार्य परोपकारी वृत्ति से ही चलते हैं । इसलिए मेरा मानना है कि समाज का सच्चा कल्याण और उन्नति परोपकार वृत्ति के बल पर ही संभव है ।