शीर्षक : बूँद-बूँद से बदला गाँव
सूखापुर गाँव की लड़कियाँ — मीना, सलमा, कविता और रेखा — पढ़ने में बहुत होशियार थीं । पर गाँव में पानी का भारी अभाव था । हर सुबह उन्हें माँ की मदद के लिए घड़े लेकर दो किलोमीटर दूर के कुएँ से पानी लाना पड़ता था । इसके बाद घर के दूसरे काम भी करने पड़ते । पढ़ाई के लिए बहुत कम समय बचता और वे कई बार देर से स्कूल पहुँचतीं ।
एक दिन स्कूल में विज्ञान के शिक्षक ने वर्षा जल संचयन के बारे में बताया । शाम को चारों लड़कियों ने इस समस्या पर चर्चा की । कविता बोली, ‘‘बरसात का सारा पानी बहकर चला जाता है, यदि हम उसे रोक लें तो साल भर पानी मिल सकता है ।’’ उन्होंने शिक्षक की मदद से एक योजना बनाई ।
लड़कियों ने ग्राम सभा में अपनी योजना रखी । पहले कुछ लोग हँसे, पर सरपंच जी ने उनका साथ दिया । गाँववालों ने श्रमदान करके पुराने तालाब को गहरा किया, छतों के पानी को टंकियों में जमा करने की व्यवस्था की और कुएँ के पास सोख्ता गड्ढे बनाए ।
अगली बरसात में तालाब और टंकियाँ पानी से भर गईं । कुएँ का जलस्तर बढ़ गया और गाँव में ही पानी मिलने लगा । अब लड़कियों को दूर नहीं जाना पड़ता था । उन्हें पढ़ाई के लिए पूरा समय मिलने लगा और उस वर्ष चारों ने परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किए । पूरे गाँव ने उनकी सूझ-बूझ की प्रशंसा की ।
सीख : मिलकर प्रयत्न किया जाए तो बड़ी-से-बड़ी समस्या भी सुलझ सकती है ।