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2. (अ) निम्नलिखित पठित पद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए : (6 अंक)विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूमभिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम।‘यवन’ को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टिमिला था स्वर्ण भूमि क…

2. (अ) निम्नलिखित पठित पद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए : (6 अंक)

विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम
भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम।
‘यवन’ को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि
मिला था स्वर्ण भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि।
किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं
हमारी जन्मभूमि थी यहीं, कहीं से हम आए थे नहीं।.........
चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न
हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न।

(1) कृति पूर्ण कीजिए : (2)
चरित थे → ........ ; भुजा में → ........ ; नम्रता रही → ........ ; हृदय के गौरव में → ........

(2) उत्तर लिखिए :
(i) पद्यांश से लय-ताल युक्त शब्द ढूँढ़कर लिखिए : (1)
(1) ........ ........ (2) ........ ........
(ii) निम्नलिखित प्रत्यययुक्त शब्दों के मूलशब्द पद्यांश से ढूँढ़कर लिखिए : (1)
(1) दयालु – (2) प्राकृतिक –

(3) उपर्युक्त पद्यांश की प्रथम चार पंक्तियों का सरल अर्थ 25 से 30 शब्दों में लिखिए। (2)

1 answer

Best answer

(1) चरित थे – पूत (पवित्र); भुजा में – शक्ति; नम्रता रही – सदा संपन्न; हृदय के गौरव में – था गर्व

(2) (i) (1) धूम – घूम (2) दृष्टि – सृष्टि (अन्य : नहीं – यहीं, संपन्न – विपन्न)
(ii) (1) दयालु – दया (2) प्राकृतिक – प्रकृति

(3) कवि कहते हैं कि भारत ने संसार में केवल शस्त्रों (लोहे) से नहीं, बल्कि धर्म से विजय पाई। यहाँ के सम्राट भी भिक्षु बनकर घर-घर घूमकर दया का संदेश देते थे। भारत ने यवनों को दया का दान दिया, चीन को धर्म की दृष्टि दी, स्वर्णभूमि को (धर्म रूपी) रत्न दिया और सिंहल (श्रीलंका) को शील का उपदेश दिया।

Doubtly AI · 24 Oct 2026 AI-verified · Oct 2026 Report
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