शीर्षक : नन्ही गिलहरी का घर
गरमी के दिन थे। सरला दादी हर साल की तरह आँगन में चावल के पापड़ बनाकर धूप में सुखा रही थीं। उनका छह साल का पोता चिंटू पास बैठा उन्हें देख रहा था। तभी नीम के पेड़ से एक नन्ही गिलहरी उतरी, एक पापड़ का टुकड़ा मुँह में दबाया और फुर्ती से भाग गई।
दादी चिल्लाईं, ‘‘अरे ! चोर गिलहरी !’’ पर चिंटू हँस पड़ा। अगले कई दिनों तक यही होता रहा। दादी परेशान थीं कि पापड़ कम क्यों हो रहे हैं। एक दिन चिंटू ने देखा कि गिलहरी पापड़ के टुकड़े लेकर बरामदे में रखी पुरानी लकड़ी की अलमारी के पीछे जाती है।
चिंटू ने धीरे-से झाँककर देखा तो वह हैरान रह गया। अलमारी के पीछे पुराने कपड़ों के बीच गिलहरी ने घोंसला बनाया था, जिसमें उसके तीन छोटे-छोटे बच्चे थे। माँ गिलहरी उन्हीं के लिए पापड़ के टुकड़े ले जा रही थी।
चिंटू दौड़कर दादी को बुला लाया। यह देखकर दादी का गुस्सा पल भर में गायब हो गया। उन्होंने कहा, ‘‘बेचारी माँ है, अपने बच्चों का पेट भर रही है।’’ उस दिन से दादी रोज एक कटोरी में थोड़े चावल और पापड़ के टुकड़े अलमारी के पास रखने लगीं, और चिंटू ने सबसे कह दिया कि उस अलमारी को कोई नहीं हटाएगा।
कुछ हफ्तों बाद गिलहरी के बच्चे बड़े होकर आँगन में दौड़ने लगे। चिंटू उन्हें देखकर खुशी से ताली बजाता।
सीख : हर प्राणी के व्यवहार के पीछे कोई कारण होता है; हमें प्राणियों के प्रति दया और समझ रखनी चाहिए।