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Shram Sadhna Notes Summary Questions SSC Class 10 Hindi Lokbharati

Doubtly 1 min read Updated 25 Oct 2026 Save WhatsApp
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यह पाठ एक वैचारिक निबंध है जिसके लेखक श्रीकृष्णदास जाजू हैं। इसमें लेखक ने श्रम की महत्ता को स्थापित करते हुए शारीरिक और बौद्धिक श्रम के अंतर और आर्थिक-सामाजिक समानता पर विशेष बल दिया है।

रचनाकार परिचय

श्रीकृष्णदास जाजू का जन्म सन् 1882, अकासर (राजस्थान) तथा मृत्यु सन् 1955, जयपुर (राजस्थान) में हुई। आप सन् 1920 में महात्मा गांधीजी के संपर्क में आए और देशसेवा के कार्य में जुट गए, जिसके कारण लोग आपको आदरस्वरूप 'तपोधन' कहते थे।

सारांश

निबंध की शुरुआत में लेखक ने मानव इतिहास की पुरानी मान्यताओं जैसे गुलामी की प्रथा और राजसत्ता के परिवर्तन का उल्लेख किया है। जैसे सदियों पुरानी गुलामी और राजाओं का राज अंततः समाप्त हुआ, वैसे ही संपत्ति के स्वामित्व और उसके अधिकार पर भी नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।

संपत्ति के संदर्भ में लेखक स्पष्ट करते हैं कि सोना-चाँदी या नोट केवल माप-तौल के साधन हैं। अन्न, वस्त्र और मकान मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं। ये चीजें प्रकृति के द्रव्य और मनुष्य के शरीर श्रम से बनती हैं। केवल बौद्धिक श्रम से कोई उपयोगी चीज नहीं बन सकती, इसलिए संपत्ति के निर्माण में शारीरिक श्रम अनिवार्य है।

समाज में बुद्धिजीवियों और श्रमजीवियों दोनों की आवश्यकता है, परंतु विडंबना यह है कि पसीना बहाने वाले मजदूरों और किसानों को कष्ट और कम आमदनी मिलती है, जबकि केवल व्यवस्था संभालने वाले लोग अमीर बन जाते हैं। व्यापारी और उद्योगपति सस्ती खरीद और महँगी बिक्री के नियम से मुनाफा कमाते हैं।

समाज से शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति का यह कर्तव्य बनता है कि वह समाज को अधिक से अधिक दे और बदले में कम से कम ले। आर्थिक विषमता और शोषण को मिटाने के लिए गांधीजी ने अहिंसा का मार्ग और शारीरिक-बौद्धिक श्रम के संतुलन का सूत्र दिया है।

अंत में लेखक बताते हैं कि हमें शरीर श्रम को हीन दृष्टि से देखने की अपनी मानसिकता को बदलना होगा। जब तक श्रमिक अपने श्रम का सही मूल्य और समाज को जिंदा रखने की उसकी क्षमता को नहीं समझेगा, तब तक देश में वास्तविक आर्थिक क्रांति नहीं आ सकती।

माइंड मैप

श्रम साधना

  • संपत्ति के साधन
    • सृष्टि के द्रव्य
    • मनुष्य का शरीर श्रम
  • समाज के दो वर्ग
    • श्रमजीवी (किसान, मजदूर)
    • बुद्धिजीवी (मंत्री, डॉक्टर, वकील)
  • गांधीजी का सूत्र
    • चार घंटे शरीर श्रम
    • चार घंटे बौद्धिक काम
  • आर्थिक विषमता
    • बुद्धि का गलत उपयोग
    • अहिंसात्मक समाधान

निबंध का विकास क्रम

  1. ऐतिहासिक प्रथाओं (गुलामी और राजसत्ता) का पतन
  2. संपत्ति का वास्तविक अर्थ और प्राथमिक आवश्यकताएँ
  3. संपत्ति निर्माण में शरीर श्रम की अनिवार्यता
  4. श्रमजीवियों और बुद्धिजीवियों के जीवन की विषमता
  5. समाज के प्रति व्यक्ति का कर्तव्य
  6. गांधीजी का श्रम और अहिंसा का वैचारिक सूत्र
  7. श्रम के प्रति हीन भावना को बदलकर उसकी प्रतिष्ठा स्थापित करना

विषय और संदेश

श्रम की प्रतिष्ठा

शारीरिक श्रम को हीन मानने की मानसिकता को त्यागकर उसे समाज में उच्च सम्मान और प्रीति दिलाना।

आर्थिक और सामाजिक समानता

धन और संपत्ति के संकेंद्रण को रोककर अहिंसा और सहकार पद्धति के माध्यम से समाज में विषमता को दूर करना।

याद रखने योग्य मुख्य बिंदु

  • संपत्ति के मुख्य दो साधन हैं - सृष्टि के द्रव्य और मनुष्य का शरीर श्रम।
  • अन्न, वस्त्र और मकान मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं।
  • बुद्धिजीवियों का जीवन श्रमजीवियों के परिश्रम पर ही आधारित होता है।
  • गांधीजी के अनुसार पेट भरने के लिए हाथ-पैर और ज्ञान प्राप्ति के लिए बुद्धि का उपयोग होना चाहिए।
  • समाज का कल्याण स्वार्थ वृत्ति से नहीं बल्कि परोपकार वृत्ति से होता है।

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
तत्त्ववेत्तातत्त्वज्ञ (philosopher / knower of truth)
हुकूमतशासन (rule / government)
दफाबार, मरतबा (time / instance)
नगण्यानगण्य / बहुत कम (negligible)
तपोधनतपस्या ही जिनका धन है (rich in penance)
विशदविस्तृत / व्यापक (detailed / comprehensive)
कृतज्ञउपकार मानने वाला (grateful)
विषमताअसमानता (inequality)
ट्रेस्टीन्यासी / संरक्षक (trustee)
मत्स्य न्यायबड़ी मछली द्वारा छोटी मछली को खाना यानी बलवान का अधिकार (law of the jungle / might is right)

अलंकार और काव्य सौंदर्य

अलंकार/विशेषताउदाहरणस्पष्टीकरण
मुहावरागुजर-बसर होनाइसका अर्थ आजीविका चलना है, जिसका प्रयोग भाषा को प्रभावशाली बनाने के लिए किया गया है।
लोकोक्ति / नीतिवचनजंगल का कानून या मत्स्य न्यायस्वार्थवृत्ति और स्पर्धा के बुरे परिणामों को स्पष्ट करने के लिए इस पारंपरिक रूपक का प्रयोग किया गया है।

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

Q1. संपत्ति के मुख्य दो साधन कौन-से हैं?

संपत्ति के मुख्य दो साधन हैं: १. सृष्टि के द्रव्य और २. मनुष्य का शरीर श्रम।

Q2. मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ कौन-सी हैं?

अन्न, वस्त्र और मकान मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं, जिनके बिना उसकी गुजर-बसर नहीं हो सकती।

Q3. व्यापारी और उद्योगपतियों के लिए अर्थशास्त्र ने क्या नियम बताया है?

व्यापारी और उद्योगपतियों के लिए अर्थशास्त्र ने यह नियम बताया है कि खरीद सस्ती-से-सस्ती हो और बिक्री महँगी-से-महँगी तथा मुनाफे की कोई मर्यादा न हो।

Q4. आर्थिक और सामाजिक विषमता को दूर करने के लिए गांधीजी ने क्या सूत्र बताया है?

गांधीजी ने यह सूत्र बताया है कि पेट भरने के लिए हाथ-पैर (शारीरिक श्रम) और ज्ञान प्राप्त करने तथा देने के लिए बुद्धि का उपयोग हो। हर एक को चार घंटे शरीर श्रम और चार घंटे बौद्धिक काम करने का मौका मिले।

Q5. समाज में श्रमजीवियों की क्या स्थिति है?

श्रमजीवियों की मजदूरी और आमदनी कम होती है, समाज में उनकी प्रतिष्ठा नहीं होती और उन्हें अपना जीवन प्रायः कष्ट में ही बिताना पड़ता है।

Q6. समाज का कल्याण किस वृत्ति से हो सकता है?

समाज का कल्याण स्वार्थ वृत्ति से नहीं बल्कि परोपकार वृत्ति के बल पर ही हो सकता है।

Q7. लेखक के अनुसार योग्यता प्राप्त करने में समाज का अंश क्यों अधिक है?

व्यक्ति अपनी शिक्षा और योग्यता सरकार, दानी लोगों की कृपा तथा हजारों वर्षों से तपस्वियों द्वारा संचित ज्ञान के बल पर प्राप्त करता है, इसलिए इसमें समाज का अंश अत्यधिक होता है।

Q8. पाठ में प्रयुक्त 'इक' प्रत्यययुक्त शब्द ढूँढ़कर लिखिए।

पाठ में प्रयुक्त 'इक' प्रत्यययुक्त शब्द हैं: आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, प्राकृतिक, बौद्धिक, राजनीतिक।

परीक्षा टिप्स

  • पाठ के लेखक 'श्रीकृष्णदास जाजू' का परिचय, जन्मस्थान और उनकी प्रमुख कृतियाँ अच्छे से याद रखें।
  • गांधीजी द्वारा बताए गए श्रम संबंधी सूत्रों और उनके वैचारिक बिंदुओं को उत्तरों में अवश्य शामिल करें।
  • भाषा बिंदु के अंतर्गत मुहावरों के अर्थ और उनके वाक्य प्रयोग का नियमित अभ्यास करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'श्रम साधना' पाठ की विधा क्या है?

'श्रम साधना' एक वैचारिक निबंध है जिसके लेखक श्रीकृष्णदास जाजू हैं।

लेखक श्रीकृष्णदास जाजू को लोग क्या कहकर पुकारते थे?

लोग लेखक श्रीकृष्णदास जाजू को आदरस्वरूप 'तपोधन' कहते थे।

शारीरिक श्रम के बिना संपत्ति का निर्माण क्यों संभव नहीं है?

क्योंकि प्रकृति के कच्चे द्रव्यों को उपयोगी वस्तुओं में बदलने और यंत्रों को चलाने के लिए भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शरीर श्रम की आवश्यकता होती है।

ये नोट्स बालभारती हिंदी लोकभारती पाठ्यपुस्तक (2026-27) से AI की सहायता से तैयार किए गए हैं और पाठ्यपुस्तक से जाँचे गए हैं।

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