2. (अ) ‘बरषहिं जलद’ कविता के भाव पर आधारित निम्नलिखित अंश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए : (6 अंक)(कवि : गोस्वामी तुलसीदास। कविता पाठ्यपुस्तक में है, इसलिए यहाँ छापी नहीं गई है; नीचे उसका भाव मौलिक शब्दों में दिया गया है।)प्रवर्षण पर्वत…
2. (अ) ‘बरषहिं जलद’ कविता के भाव पर आधारित निम्नलिखित अंश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए : (6 अंक)
(कवि : गोस्वामी तुलसीदास। कविता पाठ्यपुस्तक में है, इसलिए यहाँ छापी नहीं गई है; नीचे उसका भाव मौलिक शब्दों में दिया गया है।)
प्रवर्षण पर्वत पर वर्षा ऋतु का सौंदर्य देखकर श्रीराम लक्ष्मण से प्रकृति के दृश्यों की तुलना मनुष्य के स्वभाव से करते हैं। पानी से भरे बादल धरती के पास झुककर बरसते हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान विनम्र हो जाते हैं। पर्वत वर्षा की बूँदों की चोट ऐसे सहते हैं, जैसे संत दुष्टों के कठोर वचन सह लेते हैं। छोटी नदियाँ थोड़े-से पानी से भरकर किनारे तोड़ती हुई बहने लगती हैं, जैसे थोड़ा धन पाकर दुष्ट इतराने लगता है। जगह-जगह से पानी सिमटकर तालाबों में भर जाता है, जैसे सद्गुण अपने-आप सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में पहुँचकर स्थिर हो जाता है, जैसे जीव ईश्वर को पाकर अचल (शांत) हो जाता है।
कविता की पहली पंक्ति : ‘बरषहिं जलद भूमि नियराएँ’
(1) उचित जोड़ियाँ मिलाइए : (2)
[ तालिका : प्रकृति का दृश्य | मनुष्य के स्वभाव से तुलना ]
(i) पर्वत का बूँदों की चोट सहना (क) थोड़ा धन पाकर दुष्ट का इतराना
(ii) छोटी नदियों का किनारे तोड़कर बहना (ख) सज्जन के पास सद्गुणों का आना
(iii) नदी के जल का समुद्र में पहुँचकर स्थिर होना (ग) संत का दुष्टों के कठोर वचन सहना
(iv) तालाबों में पानी का भरना (घ) जीव का ईश्वर को पाकर अचल होना
(2) (i) निम्नलिखित शब्दों के अर्थ लिखिए : (1)
(1) जलद – ........ (2) भूमि – ........
(ii) निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए : (1)
(1) नदी – ........ (2) पर्वत – ........
(3) ‘बरषहिं जलद भूमि नियराएँ’ – इस पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए कविता का केंद्रीय भाव 25 से 30 शब्दों में लिखिए। (2)